नाथ सम्प्रदाय का जाति के रूप में विकसित होना
यह एक सुस्थापित सिद्धान्त है कि, प्रारमिभक काल मेंं जाति षब्द से अभिप्राय योनि होता था यथा पषु योनि, पक्षी योनि, मनुष्य योनि आदि। प्रत्येक योनि मेंं लिंग के आधार पर मनुष्य योनि मेंं भी प्रमुख रूप से दो ही जातियां अर्थात नर और मादा थी। प्रत्येक योनि मेंं चारों वर्ण थे। मनुष्य योनि के अतिरिä षेष जीवों का वर्ण जन्म से निर्धारित है। केवल मनुष्य योनि को अपने गुणजनित विषेषताओं और कर्म अनुसार अपना वर्ण निर्धारण करने की स्वतन्त्रता थी। भगवदगीता के चौथे अध्याय के 13वें ष्लोक का पूर्वाद्र्ध इस सम्बन्ध मेंं प्रकाष डालता है। ”चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागष: अर्थात मेरे द्वारा गुणों और कमोर्ं के विभागपूर्वक वर्णों की रचना की गयी है। यहां ‘चातुर्वण्र्यं पद सम्पूर्ण ब्रह्रााण्ड का उपलक्षण है। जिसका अर्थ है कि, न केवल मनुष्य वरन अखिल ब्रह्रााण्ड के ग्रह-नक्षत्र तथा उनकी छोटी से छोटी व बड़ी से बड़ी र्इकार्इ सहित समस्त सजीव-निर्जीव, चरन्द, परन्द, जलन्द, अण्डज (सरल शब्दों मेंं पषु, पक्षी, जलीय जीव-जन्तु, उभयचर, वनस्पति, देव, दानव, नर, किन्नर, प्रेत, यक्ष, गन्धर्व, पितर तथा तिर्यक) आदि सभी गुण और कर्म के अनुसार चार प्रकार के होते हैं। स्व विवेक अनुसार कर्म करने का अधिकार केवल मनुष्य को है अत: वह अपना वर्ण कर्म के अनुसार कितनी भी बार चुनने तथा बदलने का अधिकारी है। यह अधिकार देवताओं को भी नहींं है कि, वे अपना वर्ण बदल सकें। किन्तु ‘नाथ वर्ण व्यवस्थातीत है। चारों वर्णों मेंं से प्रबल प्रारब्ध के कारण जब कोर्इ व्यä ‘िनाद और ‘बिन्दु परंम्परा में से किसी भी एक के द्वारा योग मार्ग का अनुसरण प्रारम्भ करता है उसी काल से वह चारों वणोर्ं से उभयातीत होकर परम पुरुषार्थ अर्थात ‘मोक्ष की ओर अग्रसर हो जाता है। महाकाव्य काल के रामायण काल मेंं स्वयं विष्णु द्वारा निम्न जाति के डाकू रत्नाकर (महर्षि वाल्मीकि को वाल्मीकि समाज अछूत वर्ग का मानते हैं जबकि ब्राह्राण समाज उन्हें ब्राह्राण कुल में उत्पन्न होना मानते हैं) को और महाभारत के नायक Ñष्ण द्वारा अजर्ुन को योगमार्ग मेंं पृवत्त करना इस तथ्य के सर्वोत्Ñष्ट उदाहरण हैं। कहने का तात्पर्य यह कि नाथ सम्प्रदाय पृथक से कोर्इ जाति नहींं थी वरन समाज के सभी वर्ण और वगोर्ं के लियेे इस सम्प्रदाय के कपाट खुले हुए थे और आज भी कोर्इ भी व्यä चिहे वह किसी भी जाति, वंष, गोत्र, वर्ण अथवा स्थान का हो, इस सम्प्रदाय मेंं समिलित हो सकता है। इस सम्प्रदाय मेंं आज भी मनुष्य की नर और नारी नामक केवल दो ही जातियां हैं और सामाजिक प्रासिथ्ति के नाम पर भी केवल विरä तथा गृहस्थ नाथयोगी होते हैं। इस सम्प्रदाय के विस्तार का अनुमान केवल इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि, प्रत्येक वर्ण के परिवारों मेंं से कम से कम एक सदस्य नाथ सम्प्रदाय मेंं दीक्षित होता था, किन्तु उसका अपने मूल परिवार से संबन्ध कट नहींं जाता था जब तक कि वह संन्यास धारण नहींं कर ले। केवल विरä तथा संन्यासी होने पर ही उसकी सामाजिक प्रासिथति मेंं परिवर्तन होता था।
इस तथ्य के यूं तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, उज्जैन नरेष श्री भर्तृहरि सहित अनेक पौराणिक व ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं तथापि विषयपूर्ति के लियेे निकटवर्ती इतिहास के चरित्रों मेंं मलिक मुहम्मद जायसी की अनमोल Ñति पùावत के नायक राजा रतनसेन को इस Üांृखला मेंं सर्वप्रथम रखकर आमेर के तत्कालीन महाराजा पृथ्वीराज (1503-1527 र्इ0) के पुत्र रतननाथ तथा जोधपुर के महाराजा मान (1803-1843) को यहां प्रसंग की आवष्यकता पूर्ति के निमित्त उदधृत किया जा सकता है। इस Üांृखला की नवीनतम और उल्लेखनीय कड़ी के रूप मेंं वि. सं. 1951 (सन 1894) की वैषाख पूर्णिमा को मेवाड़ के शासक राणाकुल मेंं जन्में कुंवर नान्हूसिंह का नाम है। जिनके राजतिलक की चर्चा और तैयारियां अपने चरम पर थी किन्तु नियति कहें, प्रारब्ध या भाग्य कि मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम की तरह राजतिलक से ठीक पहले वे गोरक्षनाथ मनिदर, गोरखपुर (वर्तमान उत्तर प्रदेष) पहुंचा दिये गये। जहां उनकी नाथ सम्प्रदाय मेंं दीक्षा हुर्इ और वे महाराजकुंवर नान्हूसिंह से संन्यासी दिगिवजयनाथ बन गये। सन 1935 मेंं गोरक्षनाथ मनिदर के पीठाधीष्वर के पद पर आसीन हो महन्त दिगिवजयनाथ के रूप मेंं 34 वषोर्ं तक नाथ सम्प्रदाय की कीर्ति को अपने नये नाम के अनुरूप दिगिदगंतर मेंं फैलाने के चिर स्मरणीय कार्य किये। इनमेंं स्वतन्त्रता संग्राम मेंं वालनिटयर कोर का गठन, चोरा-चोरी काण्ड मेंं सक्रिय भूमिका के कारण गिरफ्तारी, सन 1961 मेंं अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद पर रहते हुए 1965 मेंं विष्व हिन्दू धर्म सम्मेलन करवाना और 1967 मेंं लोकसभा सदस्य निर्वाचित होना आदि विषेष उल्लेखनीय हैं। पंडित कुलदीप चतुर्वेदी ‘निर्भय द्वारा रचित ‘आदर्ष योगी नामक पुस्तक मेंं वर्णन अनुसार 28 सितम्बर, 1969 (आषिवन Ñष्णा तृतीया) को षिवलीन हुए।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी अमूल्य Ñति ‘नाथ सम्प्रदाय मेंं लिखा है कि, नाथ सम्प्रदाय के अनुयायियों के घर मेंं किसी एक या दो व्यäयिें द्वारा ही कान छिदवा कर कुण्डल धारण करने की प्रथा है। यहां तक कि न केवल हिन्दू अपितु हिन्दुओं के परम्परागत कथित विरोधी मुसिलम समुदाय के लोगों मेंं भी नाथ सम्प्रदाय के अनुयायियों की एक आकर्षक संख्या रही है। पषिचमी विद्वान जार्ज वेस्टन बि्रग्स द्वारा अपनी मूल्यवान पुस्तक ‘गोरक्षनाथ एण्ड दर्षनी योगीज मेंं अलग-अलग वषोर्ं की दी गयी जनसंख्या इस सम्प्रदाय के सभी धमोर्ं की जातियों मेंं लोकप्रिय होने का प्रमाण है। वर्ष 1891 मेंं सारे भारतवर्ष मेंं नाथयोगियों की संख्या 2,14,546 थी वह वर्ष 1921 मेंं 8,02,268 हो गयी जिनमेंं 6,28,978 योगी हिन्दू थे, शेष 31,158 योगी मुसलमान व 1,41,132 योगी फकीर थे।
यधपि इस सम्प्रदाय मेंं दीक्षित लोगों का जातिक्रम मेंं व्यवहार करना 20वीं षताबिद मेंं प्रारम्भ हुआ जान पड़ता है किन्तु आत्यनितक रूप से नाथयोगी जाति की संज्ञा स्वतन्त्रता से कुछ ही वर्ष पूर्व अंगीकार हुर्इ है। क्याेंकि वर्ष 1921 की जनगणना मेंं मात्र दर्षनी योगियों की संख्या 8,02,268 थी। तब तक केवल दर्षनी योगियों को ही नाथ समझा जाता था। कारण स्पष्ट है कि, नाथयोगी के नाम पर केवल तपस्वी वेषधारी की ही कल्पना की जाती थी और नाथ अथवा योगी पद किसी जाति का परिचायक न होकर किसी व्यä किी सिथति का धोतक हुआ करता था। जबकि औगड़, अवधूत, दषनामी, गिरि, पुरी, स्वामी, गोस्वामी, सिद्ध तथा अन्य पदनाम वाले योगियों को इसमेंं षामिल नहींं किया गया है। इसके मूल मेंं कारण यह रहा कि सभी वर्ण और जातियों के लोग यधपि नाथपंथ के अनुयायी थे किन्तु, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि, उनका अपने मूल परिवार से संबन्ध कट नहींं जाता था, उनका खान-पान एवं विवाह संबन्ध अपने ही वर्ण और जाति मेंं किया जाता रहा था। बाद मेंं ये परिवार अपनी मूल जातियों से कटते चले गये और मुसिलम शासक औरंगजेब ने जब तलवार के बल पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाना प्रारम्भ किया तो अनेक हिन्दुओं द्वारा मुसिलम धर्म अपना लिया गया केवल नाथ सम्प्रदाय के अनुयायियों द्वारा औरंगजेब को करारी षिकस्त दी गयी जिसे एक चमत्कार का दर्जा औरंगजेब द्वारा दिया गया और परिणामस्वरूप सिन्ध प्रदेष के भैरागढ़ नामक स्थान पर पहले से स्थापित काफी बड़े नाथ मठ को औरंगजेब द्वारा मान्यता और जागीर प्रदान की गयी।
इतिहास के इस संक्राति काल के पष्चात एक समय ऐसा आया कि इन नाथयोगियों ने अपनी मूल जाति के लोगों को प्रदूषित मानकर खान-पान और विवाह व्यवहार अपने समान नाथपंथ का अनुगमन करने वाले परिवारों मेंं करना प्रारम्भ कर दिया। यहां से गृहस्थ नाथयोगियों की जाति का विकास क्रम प्रारम्भ हुआ और कालान्तर मेंं जब समान विचारधारा, जीवन यापन, रोजगार, जीवन स्तर तथा अन्य समानताओं के आधार पर वैवाहिक संबन्ध होने प्रारम्भ हुए तो इस सम्प्रदाय मेंं दीक्षित लोगों की भी एक जाति बन गयी किन्तु इसके विकासक्रम की गति वैदिक काल की वर्ण व्यवस्था से जाति व्यवस्था के विकास क्रम की गति से बहुत कम रही। इसकी तीव्रता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि, वर्ष 1970-75 तक विभिन्न वर्ण और जातियों से नाथ सम्प्रदाय मेंं दीक्षित लोग केवल अपनी मूल जाति के परिवारों से विवाह संबन्ध तथा खान-पान का व्यवहार करते रहे। अलमोडा के सतनाथी व धर्मनाथी, पंजाब व गुजरात के रावल योगी, अम्बाला के संयोगी, गढवाल के भैरव, अलर्इपुरा व रंगपुर के जुलाहे, बंगाल के जुगी, मुम्बर्इ के मराठे, कोंकण के गोसवी, उत्तर प्रदेष के ब्राह्राण, पषिचमी उत्तर प्रदेष के उपाध्याय, पूर्वी उत्तर प्रदेष के गोस्वामी, पटवा व स्वामी, हरियाणा व पंजाब के शर्मा, राजस्थान के राजपूत और दक्षिण भारत के कर्णाटकी, उड़ीसा के ओडि़या, बंगाल मेंं दक्षिणी विक्रमपुर के त्रिपुरा और नोयाखाली व उत्तरी विक्रमपुर व ढाका के एकादषी संज्ञा वाले नाथयोगी इस तथ्य का उदाहरण है। नाथयोगियों के इन अनुयायियों को गृहस्थ नाथ अथवा गृहस्थ योगी कहा जाने लगा है।
विचारणीय प्रष्न यह भी है कि, योगी पद का उच्चारण कब और किन परिसिथतियाें मेंं जोगी हो गया।
भाषा के ही सन्दर्भ मेंं देखा जावे तो देवनागरी मेंं लिखा जाने वाला ‘योग पद युरोप से श्रवह बन कर लौटता है। यूरोप के अधिकांष भू-भागों मेंं अंग्रेजी के श्र अक्षर का उच्चारण ‘य किया जाता है, जबकि भारत सहित पूर्ववर्ती भू-भागों मेंं इसे ‘ज ही बोला जाता है। इस प्रकार ‘श्रवह पद का यूरोप मेंं जो उच्चारण ‘योग किया जाता है उसे हम अंग्रेजी मेंं जोग उच्चरित करते हैंंं। इसके लिये भाषा के संबंध में किये गये शोध को उदधृत करने की न तो आवष्यकता है न हमारी मंषा हैं, किन्तु साधारण व्यकित के लिये भी यह विषय ग्राहय हो, इस हेतु यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि, एक ही प्रदेष में 15 से 20 कि.मी. की दूरी पर भौगोलिक, सांस्कृतिक, परम्परा, खान-पान आदि के साथ भाषा में भी परिवर्तन हो जाता है। एक-एक वर्ण की मीमांसा के लिये तो एक पृथक पुस्तक लिखने की आवष्यकता होगी। विषय की मांग के लिये ‘ह व ‘स वर्ण को लें तो हम पाते हैं कि, राजस्थान के मारवाड़ व मेवाड़ क्षेत्र में इन दोनों वणोर्ं का उच्चारण राजस्थान के अन्य स्थानों की अपेक्षा अलग है। जोधपूर-उदयपुर में ‘साबुन को ‘हाबुन और ‘सिद्ध को ‘हिद्ध उच्चारित किया जाता है। हिन्दी साहित्य की ब्रजभाषा, अवधी व भोजपुरी में ‘य के स्थान पर ‘ज लिखा व बोला जाता है, जैसे यमुना को जमुना, यशोदा को जशोदा, युग को जुग, यज्ञ को जज्ञ, यदुवंंशी को जदुवंशी, संयोग को संजोग, योग को जोग आदि। इसी भारत भूमि के पंजाब भाग में षिष्य को सिक्ख बोला जाता है जो नाथयोगियों की तर्ज पर पंजाब मूल के गुरूओं द्वारा स्थापित षिष्य परंपरा का स्थानीय उच्चारण के कारण ‘सिक्ख परंपरा के रूप में विकसित हुर्इ है। महायोगी गोरक्षनाथ की कृतियों और नाथयोगियों द्वारा गूढ शब्दावलियों की वाणियों का अध्ययन करें तो बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि उनकी लिपि में ‘ष वर्ण नहीं है और ‘ष का उच्चारण ‘ख (”आओ सिद्धों षोज (खोज) बताऊं) है। इस विषय पर अधिक प्रकाष तो भाषा विज्ञानी कर सकते हैं। गुरू गोविन्दसिंहजी द्वारा अमृत चखा कर दीक्षित होने वाले पंज प्यारों के सन्दर्भ से हम केवल इतना तर्क दे सकते हैं कि पंजाब में रहने वाला हर व्यकित सिक्ख नहीं है वरन केवल जिसने षिष्य परंपरा से दीक्षित होकर इस मत को अपना लिया वह सिक्ख (षिष्य) की संज्ञा से जाना जाता है।
इन्हीं दो वणोर्ं के संबंध में ऐतिहासिक घटनाओं पर दृषिटपात करें तो भारत से सुदूर पषिचमी क्षेत्र र्इरान-र्इराक के समरकन्द, बुखारा और दजला फरात की खाड़ी के आक्रान्ताओं का ‘सिन्ध व ‘सिन्धु को ‘हिन्द व ‘हिन्दू उच्चारित किया जाना एक ऐसा घटनाक्रम है जिसके अन्तर्गत भारत में उस काल के सभी वर्ण, वर्ग, व जातियों को एक सम्प्रदाय ‘हिन्दू में समाहित कर दिया। जबकि हिन्दू शास्त्रों में किसी भी स्थान पर ‘हिन्दू पदवाची कोर्इ व्यä अिथवा धार्मिक संस्था नहींं है।
स्पष्ट है कि, नाथयोगी पूर्व मेंं एक सम्पूर्ण जाति होते हुए भी जाति संज्ञा से युä नहींं थी। यधपि यह सामाजिक व्यवस्था का एक अनुपम आदर्ष थी और जिसमेंं सभी वर्ण और जातियों के लोगों को समान सामाजिक स्तर प्राप्त था। कर्णच्छेद संस्कार पष्चात षिव वेषधारी ‘योगी जाति और वर्ण व्यवस्था से भी ऊपर उठकर समाज मेंं सभी के लियेे पूज्य हो जाता था। किसी व्यकित के नाम के साथ नाथ अथवा योगी पद लगने के बाद सम्पूर्ण विष्व उसका परिवार और स्वयं का मोक्ष व जगत का कल्याण ही उसका उíेष्य रह जाता है।
पंथ जनित मतभेद तथा प्रत्येक परिवार की मूल जाति और पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग-अलग होने के कारण यह समाज आज बहुत सीमित और बिखरा हुआ है। वर्ष 1973 मेंं पहली बार इस सम्प्रदाय के गृहस्थ नाथयोगियों को संगठित करने के प्रयास नेपाल के योगी प्रवर नरहरिनाथजी शास्त्री की प्रेरणा से भूतपूर्व राष्ट्र अध्यक्ष श्री वी.वी गिरि की संरक्षकता मेंं प्रारम्भ हुए और अखिल भारतवर्ष नाथ समाज नाम से इस संगठन का पंजीयन हुआ। जिसके प्रथम अध्यक्ष डा0 लक्ष्मीचन्द्र शास्त्रीजी निर्वाचित हुए और जिसकी राजस्थान शाखा के प्रथम अध्यक्ष जयपुर निवासी योगी मानसिंह तंवर (नाथजी बापू) तथा महामंत्री योगी कन्हैयानाथ मिश्रा रहे। प्रान्तीय स्तर पर भी राजस्थान नाथ समाज एवं राजस्थान नाथयोगी समाज और इसी प्रकार जिला स्तर पर भी संगठन चल रहे हैं।
स्वतन्त्रता आन्दोलन से लेकर वर्तमान तक के राष्ट्रीय विकास मेंं इस समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस समाज के लोग उच्च षिक्षा प्राप्त चिकित्सक, इन्जीनियर, वकील, पुलिस आफिसर, अघ्यापक, पत्रकार, होने के अलावा साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र मेंं भी अपनी सेवाएं राष्ट्र को अर्पित कर रहे हैं। (यधपि इनकी संख्या बहुत कम है किन्तु इनकी कुल जनसंख्या के आनुपातिक प्रतिषत को दृषिटगत रखा जावे तो यह योगदान उल्लेखनीय हो जाता है)। कुरीतियों के नाम पर मात्र भर्तृहरि बैराग पंथ के नाथयोगियों मेंं भिक्षावृति अवष्य है, जो कि वास्तव में अहंकार के निवारणार्थ और सामाजिक एकता के लियेे गुरु गोरक्षनाथजी द्वारा बताया गया उपाय है। तदनुसार जाति, वर्ण और कुल के आधार पर भेद किये बिना याचना करने पर मात्र तीन घरों से जो कुछ भी, जैसा भी और जितना भी मिल जाये उससे निर्वाह करने की आज्ञा हैं, किन्तु इस आज्ञा का अतिक्रमण करके लोगों ने इसे व्यवसाय ही बना लिया। बहरहाल यह कुरीति केवल ग्रामीण क्षेत्रों मेंं है, जो बदलते परिवेष मेंं अपनी अनितम सांसें ले रही है।
इस प्रसंग को मात्र यह लिखकर समाप्त करना चाहूंगा कि नाथ सम्प्रदाय के आदि प्रवर्तक गुरु गोरक्षनाथजी का ही इतिहास मेंं कोर्इ उल्लेख नहींं है। जिनके बिना कम से कम भारतवर्ष के दर्षन, संस्Ñति, साहित्य और इतिहास की कल्पना तक नहींं की जा सकती। योग और योग के सिद्धान्तों की चर्चा करने वाले सर्वप्रथम जिनके आषीर्वाद और Ñपा की कामना करते हों, किसी भी क्षेत्र मेंं जागृति और चेतना लाने के लियेे पर्याय के रूप मेंं उनके महावाक्य ‘अलख जगाने षब्द को अधिक प्रभावकारी और षुभ मानते हों, ”घट-घट वासी गोरक्ष अविनाषी, टले काल मिटे चौरासी जैसी पंäयिं बोलकर उन्हें परमात्मा का दर्जा देते हों, ऐसे महान व्यकितत्व के जन्म स्थान, जन्म काल तथा समाधिस्थ होने के संबन्ध मेंं इतिहास मौन हो, यहां तक कि षिक्षा के किसी भी स्तर की पाठय पुस्तकों मेंं उनका और उनके दर्षन का संक्षिप्त सा परिचय भी नहींं दिया गया हो तो फिर छोटी-छोटी सिद्धियों से युä इन नाथयोगियों की इतिहास मेंं चर्चा नहींं होना कोर्इ आष्चर्य की बात नहींं है। इसके मूल मेंं केवल दो ही कारण हैं।
प्रथमत: नाथयोगियों ने अपनी योग विधा को आजीविका का साधन नहींं बना कर वर्गजनित पक्षपात और वर्णजनित भेदभाव के बिना, सभी दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों से दूर रहकर प्रत्येक जिज्ञासु को उदारतापूर्वक अपना समस्त ज्ञान धन दे दिया। Ñतज्ञ लोगों ने इसे मात्र आत्मोद्धार के लियेे अपनाया और इस ज्ञान केा केवल दान स्वरूप देने की परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं। किन्तु जो स्वार्थी तत्त्व रहे उन्होंने इस विधा को व्यवसाय बना लिया। सिद्धयोग के दो सोपानों में से कुछ के द्वारा हठयोग के आरमिभक आसनों और राजयोग की कि्रयाओं के अल्पज्ञान के साथ विष्व स्तर पर कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली मेंं खोले गये योग साधना केन्द्र और संस्थाएं ऐसे स्वार्थियों की Ñतघ्नता का जीवन्त प्रमाण है।
द्वितीयत: कोर्इ भी सिद्ध पुरुष इतिहास का हिस्सा बनने की नीयत से न तो साधना करता है और ना साधना के मार्ग मेंं स्वत: प्राप्त होने वाली सिद्धियों के चमत्कार का प्रदर्षन करता है। जो जीवन काल मेंं ही जीवन मुä हो जाने की कामना मात्र से विरä और संन्यासी होकर गुमनाम स्थानों पर साधना करते हैंंं, वे इतिहास मेंं मृत षब्द की भांति अमर होना अपने उíेष्य से भटक जाना मानते हैं। सत्य तो यह है कि, एक बार योग मार्ग मेंं प्रवृत्त हो जाने वाला व्यä अिैर किसी मार्ग पर जा ही नहींं सकता। क्योंकि उपासना के सभी मार्ग अन्ततोगत्वा ‘योग मेंं ही समाप्त होते है और इसका कोर्इ विकल्प भी नहींं है। साधक चाहै कि,सी भी साधन से अपने साध्य की साधना करे उसका अनितम उíेष्य अपने साध्य से योग स्थापित करना ही होता है। फिर साध्य चाहे महादेव जैसा महायोगी हो या Ñष्ण जैसा कर्मयोगी। इस तथ्य से कौन इन्कार कर सकता है कि, श्रीÑष्ण योग मार्ग मेंं षिव के एक प्रतिनिधि मात्र हैं और श्रीÑष्ण का एक विग्रह श्रीनाथजी के नाम से प्रख्यात है। महादेव षिव की विष्व मेंं सब जगहों पर ‘नाथ के नाम से पूजा नहींं होती तो भी वह रहते ‘विष्वनाथ ही हैं। इसी प्रकार ‘श्रीनाथजी मुरलीमनोहर, रासबिहारी, बृजबिहारी, गोविन्ददेव या किसी भी उपमा से पूजित क्यों ना हों, वह रहते द्वारिकानाथ और ‘श्रीनाथजी ही हैं। इसी प्रकार श्रीराम की भी सभी संज्ञाएं अन्ततोगत्वा श्रीराम रघुनाथ समाहित होकर समाप्त हो जाती है। यह आवष्यक नहींं कि प्रत्येक योगी के नाम के साथ ‘नाथ उपमा लगी हो जैसे- संत ज्ञानेष्वर, नामदेव, गोपीचन्द, भर्तृहरि आदि। अर्थ की दृषिट से ‘देव और ‘नाथ का मतलब स्वामी होता है अत: गोविन्दनाथजी के मनिदर को गोविन्ददेवजी का मनिदर कहने से भी महाराजा जयसिंह या पष्चातवर्ती नरेष नाथ मत से परामुख नहींं हो जाते।
वस्तुत: इस सम्बन्ध मेंं नाथ सम्प्रदाय, उसकी परम्पराओं एवं विभिन्न 12 पंथों की जानकारी के अभाव मेंं कोर्इ भी व्यä टिप्पणी करने मेंं सक्षम नहींं हो सकता। इस सम्प्रदाय पर टिप्पणी करने से पूर्व टीकाकार को यह जान लेना चाहिये कि यह सम्प्रदाय न केवल आदि सम्प्रदाय होकर पष्चातवर्ती समस्त सम्प्रदायों का जनक है वरन यह भी कि प्रचलित सम्प्रदायों मेंं मात्र यही सम्प्रदाय ऐसा है, जो उपासना की सगुण और निगर्ुण दोनों पद्धतियों को समान रूप से अपनाता है। अर्थात सगुण रूप से षिव को स्वरूप से और निगर्ुण रूप से षिव को तत्त्व रूप से आराधना करना इस सम्प्रदाय की विषेषता है।
उä सभी 12 पंथों व उनकी परम्पराओं का संक्षिप्त वर्णन करने के लियेे भी एक पृथक ग्रन्थ की रचना करनी पड़ेगी जो यहां अभीष्ट नहींं है और जोधपुर नरेष मानसिंह ने इस विषय पर कहने लिखने के लियेे अधिक कुछ नहींं छोड़़ा। तथापि प्रस्तुत विषय को समझने के लियेे इन पंथों के नाम, मूल प्रवर्तक तथा इनके प्रवर्तन स्थान की बहुत संक्षिप्त चर्चा आवष्यक है। इस प्रसंग की हमने ‘नाथ सम्प्रदाय के 12 पंथ शीर्षकान्तर्गत पृथक से चर्चा की है।
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